Khatu Shyam ki Jeevani । खाटू श्याम की जीवनी

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खाटू श्याम की जीवनी (Khatu Shyam Ki jeevani) – खाटू श्याम (Khatu Shyam) कहें ,हारे का सहारा कहें , श्याम धणी कहें ,शीश के दानी कहें या फिर चाहे मोरछड़ी वाला कहें , कलयुग के अवतारी बाबा को सच्चे मन से याद करते ही कष्टों का निवारण होता है । 

भक्तों की अपार शृद्धा के कारण खाटू धाम में असंख्य भक्त श्याम बाबा के दर्शन के लिए आते है । राजस्थान के सीकर जिलान्तर्गत आने वाले खाटू शहर में श्याम बाबा का बड़ा ही भव्य और चमत्कारी दरबार (मंदिर ) है । आइये आज हम जानते हैं कि खाटू श्याम (Khatu Shyam ki jeevani) बाबा कहां से आये, उनको कैसे वरदान मिला। ऐसे ही अन्य सवालों का उत्तर ढूंढने के लिए आज की यात्रा की शुरुवात करते है।

Khatu Shyam (बर्बरीक) का जन्म और शिक्षा

बात है द्वापर युग की जब योगेश्वर भगवान् वासुदेव श्री कृष्ण ने अवतार लिया था । उसी युग में जब कौरवों और पांडवों के बीच महाभारत का धर्मयुद्ध हुआ था तब उस युद्ध में एक योद्धा ऐसा भी था जो कि अजेय था । अतुलित बलशाली और देवताओं व जगदम्बा माता से शक्तियां प्राप्त ये योद्धा जब युद्ध के लिए कुरुक्षेत्र पंहुचा तो स्वयं भगवान श्री कृष्ण का भी बना बनाया समीकरण बिगड़ने लगा और वासुदेव श्री कृष्ण को कुछ ऐसा करना पड़ा जो कि अनपेक्षित था ।

पूरी कहानी (Khatu Shyam ki jeevani) के लिए थोड़ा और पीछे चलते है । दरअसल महाबली,गदाधारी भीम का वनवास के दौरान राक्षस पुत्री हिडिम्बा से विवाह हुआ था और भीम का हिडिम्बा से एक महाबली पुत्र हुआ जिसका नाम घटोत्कच था । बड़ा होने पर घटोत्कच का विवाह दैत्य मूर की पुत्री मोरवी से हुआ । 

घटोत्कच और मोरवी के यहां एक अति बलशाली और महाप्रतापी पुत्र का जन्म हुआ जिसके बाल शेर कि तरह होने के कारण उसका नाम बर्बरीक रखा गया । बर्बरीक अपने बचपन से ही वे बहुत वीर और महान योद्धा थे ।

बर्बरीक कि माता , दैत्य मूर की पुत्री मोरवी सैन्य कला में माहिर थी और बर्बरीक की पहली गुरु उसकी माता ही थीं । उन्होंने अपनी माता से सैन्य कला सीखी । आरंभिक शिक्षा के बाद महाबली भीम उन्हें वासुदेव श्री कृष्ण के पास लेकर गए और उसे शिक्षा देने के लिए उनसे प्रार्थना की । 

बर्बरीक बहुत ही बुद्धिमान बालक थे उन्होंने भगवान श्री कृष्ण से पूछा कि “हे भगवान ! मुझे इस जीवन का सार बताइये, इस जीवन का सर्वोत्तम उपयोग क्या है? “

छोटे से बालक के मुँह से ऐसा गूढ़ प्रश्न सुनकर श्री कृष्ण भी उनसे प्रभावित हुए और बोले ” हे पुत्र बर्बरीक, इस जीवन का सर्वोत्तम उपयोग परोपकार करना और निर्बल का साथ देकर सदैव धर्म का पालन करने से है।” परन्तु इसके लिए तुम्हे पहले खुद को मजबूत बनाना होगा और शक्तियां अर्जित करनी होंगी । 

श्री कृष्ण ने जहा जाओ, महीसागर क्षेत्र में जाकर नवदुर्गा की आराधना करो और उनसे शक्तियाँ प्राप्त करो । वासुदेव श्री कृष्ण ने उनके सरल हृदय से प्रभावित होकर वीर बालक बर्बरीक को “सुहृदय” नाम से भी अलंकृत किया था ।

वीर बर्बरीक ने श्री कृष्ण के आदेशनुसार महिसागर क्षेत्र में 3 वर्ष तक कठिन तपस्या करके नवदुर्गा को प्रसन्न कर किया एवं साथ ही साथ अश्त्र शाश्त्र में भी महारथ हासिल की । बबरीक की सच्ची निष्ठां एवं उनके कठोर तप से प्रभावित होकर माता ने उन्हें बहुत सी शक्तियां प्रदान की । 

जगदम्बा ने उन्हें तीन ऐसे वाण दिए जिनसे तीनो लोकों पर एक साथ विजय प्राप्त की जा सकती थी ।नवदुर्गा की तपस्या करके जो तीन अमोध वाण प्राप्त किये उसके कारण उनका नाम ” तीन बाणधारी ” पड़ा । उन्हें अग्निदेव से एक धनुष प्राप्त हुआ था जो की अत्यंत ही चमत्कारी धनुष था ।

माता जगदम्बा का एक ब्राह्मण भक्त था विजय । माता ने बर्बरीक को आदेश दिया कि मेरे परम भक्त विजय कुछ सिद्धियां प्राप्त करना चाहता है परन्तु कुछ राक्षस उसमे हमेशा बाधा डाल देते है, जाओ और जाकर उसकी सहायता करो । वीर बर्बरीक ने पिंगल,दुहद्रुहा, रेपलेंद्र तथा नौ कोटि नामक मांसभक्षी राक्षसों के विशाल समूह को अग्नि की भाँति भस्म कर दिया और माँ के परम भक्त विजय का यज्ञ सम्पूर्ण कराया। 

उस ब्राह्मण का यज्ञ सम्पूर्ण करवाने पर सभी देवी-देवता वीर बर्बरीक से अति प्रसन्न हुए और प्रकट होकर बर्बरीक को यज्ञ की भस्मरूपी अनेकोनेक शक्तियाँ प्रदान कीं।

 

Khatu shyam ki jeevani

खाटू श्याम (Khatu Shyam ki jeevani) के पूर्वजन्म की कहानी

(Khatu Shyam ki jeevani) में आगे जाकर कौरवों और पांडवों के बीच युद्ध तय हो गया । जब बर्बरीक को पता चला तो वे भी युद्ध में भाग लेने के लिए अपनी माता के पास आज्ञा लेने चले गए । माता ने उन्हें शर्त के साथ आज्ञा दी । शर्त ये थी की तू हमेशा हारे को सहारा देगा । 

युद्ध में जो पक्ष हारता हुआ लगे तुझे उसी का साथ देना है । अपनी माता को वचन देकर वे युद्ध क्षेत्र के लिए निकल पड़े । अब यहां पर योगेश्वर भगवान् वासुदेव कृष्ण को जब अंदेशा हुआ कि बर्बरीक युद्ध में भाग लेने आ रहा है तो उन्होंने ब्राम्हण का भेष धारण किया और बर्बरीक की राह में आकर उन्हें रोक लिया । एक तो श्री कृष्ण को उनकी शक्तियों को परखना था और दूसरा एक किस्सा बर्बरीक के पूर्वजन्म से जुडा हुआ है, तो आइये पहले उनके पूर्वजन्म में चलते है ।

“द्वापरयुग के आरम्भ होने से पूर्व की बात है । मूर नामक दैत्य ने पृथ्वी पर भारी आतंक मचाया हुआ था । मूर के अत्याचारों से अत्यंत दुखी हो जाने के कारण स्वयं धरती माता (पृथ्वी ) गाय के रूप में देवताओं के पास गईं और उन्होंने सभी देवताओं से प्रार्थना की कि “ हे देवताओं ! मैं सभी प्रकार का दुःख और संताप सहन करती हूँ। 

पहाड़, नदी, नाले एवं समस्त मानव जाति का भार मैं सहर्ष सहन करते हुए भी कभी अपनी दैनिक जिम्मेदारियों से मुँह नहीं मोड़ती , परंतु मैं अब मूर दैत्य के अत्याचारों से अति दु:खी हूँ। आपलोग इस अत्याचारी से मेरी रक्षा कीजिए, मैं आपके शरण में आयी हूँ। ”

ब्रह्मा जी ने कहा “मूर राक्षस अत्यंत शक्तिशाली है उससे छुटकारा पाने का एक मात्र उपाय यही है कि हम सभी को भगवान् विष्णु की शरण में जाना पड़ेगा अब वही पृथ्वी के इस संकट को ख़त्म कर सकते है ।” उस देवसभा में यक्षराज सूर्यवर्चा भी विराजमान थे , उन्होंने अभिमानवश बोल दिया कि मूर राक्षस का वध करने के लिए भगवान विष्णु को कष्ट देने की क्या आवश्यकता है । आप आज्ञा दीजिये मैं ही उस राक्षस का वध कर सकता हूँ ।

इतना सुनते ही ब्रह्मा जी बोले— “ हे नादान ! तुमने अपने अहंकार से इस देवसभा को चुनौती दी है। तुम्हे इसका दण्ड अवश्य मिलेगा। तुमने खुद को भगवान् विष्णु जी से श्रेष्ठ समझा। तुम्हारा जन्म राक्षस योनि में होगा और जब द्वापरयुग के अंतिम चरण में पृथ्वी पर एक भीषण धर्मयुद्ध होगा तब स्वयं भगवान्तु विष्णु तुम्हारा सर काटेंगे और तुम हमेशा हमेशा के लिए राक्षस बने रहोगे।”
यक्षराज सूर्यवर्चा ब्रह्मा जी के चरणों में गिर पड़ा और विनम्र भाव से बोला “ हे प्रभु ! क्षमा करें ,भूलवश निकले इन शब्दों के लिए मुझे इतना बड़ा दंड ना दें । हे भगवन ! मैं आपके शरणागत हूँ ।”

दया के सागर परमपिता ब्रम्हा को उस पर दया आ गई और उन्होंने कहा ” हे नादान ! तूने देवसभा का अपमान किया है भले ही भूलवश किया है , दंड तो अवश्य ही मिलेगा , मैं तुम्हारे दंड को थोड़ा सरल कर देता हूँ । 

भगवान् श्री कृष्ण स्वयं अपने सुदर्शन चक्र से तुंहारा शीश काटेंगे फिर देवियों द्वारा तुम्हारे शीश का अभिसिंचन होगा । तुम्हारे द्वारा अपने शीश का दान करने के कारण वासुदेव भगवान् श्री कृष्ण स्वयं तुम्हे कलयुग में पूजनीय होने का वरदान देंगे । “

खाटू श्याम (Khatu Shyam ki jeevani) द्वारा शीश का दान

Khatu Shyam ki jeevani में अब हम वापस द्वापर में आते है । भगवान् श्री कृष्ण ने ब्राम्हण के भेष में बर्बरीक को रोका और कहा कि तुम ये तीन वाण लेकर इस महायुद्ध में जा रहे हो, तीन वाण से तुम क्या कर लोगे । बर्बरीक ने कहा कि मेरा एक ही वाण विरोधी दाल के सभी योद्धाओं को ख़त्म करने के लिए काफी है , और ये अपना समस्त कार्य पूर्ण करके वापस मेरे पास भी आ जाता है । 

श्री कृष्ण ने कहा कि क्या ये वाण इस पीपल के वृक्ष के सभी पत्तों का छेदन करके वापस तुम्हारे पास आ सकता है । ये चुनौती वीर बर्बरीक ने स्वीकार की और मंत्रोच्चारण के साथ एक वाण चला दिया ।

इस दौरान श्री कृष्ण ने एक वाण अपने पैर के नीचे दबा लिया था । पल भर में वह बाण पेड़ के समस्त पत्तों का छेदन करके भगवान् के पैर के चक्कर लगाने लगा । वासुदेव श्री कृष्ण उसकी शक्ति को समझ गए थे । श्री कृष्ण ने पुछा की तुम युद्ध करने तो जा रहे हो परन्तु तुम युद्ध किसकी तरफ से करोगे । 

बर्बरीक ने अपने प्रण के बारे में बताया और कहा की मैं हमेशा हारे को ही सहारा देता हूँ इसलिए इस युद्ध में जिसका पलड़ा भारी रहेगा मैं उसके विरूद्ध युद्ध लडूंगा । श्री कृष्ण जानते थे कि युद्ध में कौरवों का पलड़ा हल्का ही रहने वाला है और इस कारण अगर बर्बरीक ने उनका साथ दिया तो परिणाम गलत पक्ष में चला जाएगा क्यों की भगवान् तो सच्चाई के साथ थे इसीलिए वे चाहते थे कि ये युद्ध पांडव ही जीते ।

अतः ब्राह्मण बने श्री कृष्ण ने बर्बरीक से दान की मन की , जब बर्बरीक ने वचन दे दिए तो भगवान ने उनसे उनका शीश दान में मांग लिया । दानवीर बर्बरीक तनिक भी नहीं घबराये परन्तु उन्होंने भगवान् से कहा कि आप ब्राह्मण तो नहीं हो सकते मुझे अपने वास्तविक रूप से परिचय करवाइये तब श्री कृष्ण ने उन्हें अपने रूप में दर्शन दिए । बर्बरीक ने अपनी एक अभिलाषा बताई कि मुझे पूरा युद्ध देखना है । 

श्री कृष्ण ने उनकी ये प्रार्थना स्वीकार कि तथा अपने सुदर्शन से उनका शीश धड़ से अलग कर दिया । 14 देवियों द्वारा उनके शीश का अभिसिंचन किया गया और युद्ध भूमि के पास कि एक पहाड़ी पर उनका शीश रख दिया गया जहा से वे पूरा युद्ध देख सकते थे । फाल्गुन मास की द्वादशी को उन्होंने अपने शीश का दान दिया था इस प्रकार वे शीश के दानी कहलाये।

बर्बरीक ने पूरा युद्ध देखा , युद्ध समाप्त होने के बाद पांडवों को थोड़ा सा अभिमान हो गया था । श्री कृष्ण नहीं चाहते थे कि उन्हें ये अभिमान उनके सर पर चढ़ जाये । तब उन्होंने कहा कि बर्बरीक ने पूरा युद्ध निष्पक्ष रूप से देखा है वही बताएँगे कि युद्ध में विजय किसके कारण मिली । 

जब बर्बरीक से पूछा गया तो उन्होंने बताया कि मुझे तो योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण का सुदर्शन ही चलता हुआ दिखाई दे रहा था । ये बात सुनकर अर्जुन और बाकी सब पांडवों ने भगवान से क्षमा मांगी और अपना अभिमान त्याग दिया । श्री कृष्ण वीर बर्बरीक के महान बलिदान से काफी प्रसन्न हुए और वरदान दिया कि कलियुग में तुम मेरे ही एक नाम श्याम , खाटू श्याम (Khatu Shyam)के नाम से पूजे जाओगे ।

 

khatu shyam ki jeevani

खाटू श्याम (Khatu Shyam) मंदिर का निर्माण

बर्बरीक का शीश खाटू नगर में दफनाया गया । खाटू (Khatu Shyam)वर्तमान सीकर जिले के अंतर्गत आता है । कालांतर में उसी स्थान पर एक गाय हर रोज आकर अपने स्तनों से दूध कि धारा वहां पर बहाने लगी । जब वहां के निवासियों ने कोतुहलवश उस स्थान पर खुदाई की तो वहां पर दुर्लभ पत्थर की मूर्ति के रूप में श्याम बाबा का शीश प्रकट हुआ । 

खाटू नगर के राजा को स्वप्न में खाटू श्याम (Khatu Shyam) ने दर्शन दिए और उस स्थान पर मंदिर बनाने के लिए राजा को प्रेरित किया । पहला मंदिर वहां के राजा द्वारा बनवाया गया और वहां पर श्री खाटू श्याम (Khatu Shyam) के शीश को सुशोभित किया गया । सम्वत 1720 में खाटू श्याम (Khatu Shyam) मंदिरका जीर्णोद्धार करवाया गया ।

खाटू श्याम (Khatu Shyam) का पौराणिक उल्लेख

वीर श्री बर्बरीक जी , खाटू श्याम (Khatu Shyam) का चरित्र चित्रण स्कन्द पुराण के “माहेश्वर खंड के द्वितीय उपखंड कौमारिक खंड में विस्तार पूर्वक किया हुआ है। ‘कौमारिक खंड’ के 59वे अध्याय से 66वे अध्याय तक इस दिव्य कथा का वर्णन किया हुआ है ।

59वां अध्याय : घटोत्कचआख्यान वर्णनम
60वां अध्याय : मोर्वीघटोत्कच संवाद एवं घटोत्कचद्वारा मोर्व्याबर्बरीकपुत्रोत्पत्ति वर्णनम
61वां अध्याय : महाविद्यासाधने गणेश्वरकल्प वर्णनम (बर्बरीकआख्यान वर्णनम)
62वां अध्याय : कालिकाया रुद्रविर्भाव वर्णनम
63वां अध्याय : बर्बरीकवीरता वर्णनम
64वां अध्याय : भीमततपोत्रबर्बरीकसंवाद वर्णनम
65वां अध्याय : देवीसत्वन वर्णनम, कलेश्वरी वर्णनम
66वां अध्याय : बर्बरीकबल वर्णनम, श्री कृष्णेनबर्बरीकशिरपूजनम कथम, गुप्तक्षेत्रेमहात्म्य वर्णनम

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