Danveer karn ki kahani in Hindi | दानवीर कर्ण की जीवनी

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Danveer karn ki kahani in Hindi | दानवीर कर्ण की जीवनी , आज हम एक ऐसे महावीर ,दानवीर के विषय में चर्चा करेंगे जो कि महाभारत का सबसे अपेक्षित पात्र था । वो महावीर था , वो महा दानी था वो सच में महान था । Danveer karn ki kahani in Hindi में आज हम ये जानेंगे उस महावीर और दानवीर कर्ण की कहानी जो जिस पद और जिस सम्मान का अधिकारी था वो उसे कभी नहीं मिला । ज्येष्ठ पांडव होते हुए भी उसे जीवन भर ये तक नहीं पता चला कि वह क्षत्रिय है या शूद्र ।

Danveer karn ki kahani in Hindi उस दानवीर कर्ण की कहानी है जिसे जीवन भर सूतपुत्र कह कर अपमानित किया गया और जब उन्हें उनका असली परिचय मिला तब तक बहुत देर हो चुकी थी । ये उस दानवीर कर्ण की कहानी है जिसने अपनी मित्रता में किये गए वचन को निभाने के लिए हस्तिनापुर जैसे राज्य के सम्राट का पद भी ठुकरा दिया था ।

कर्ण का जन्म कैसे हुआ

आइये दानवीर कर्ण की कहानी में सबसे पहले हम उनके जन्म की कहानी को जानते है । कुंती जब अविवाहित थीं तब उनके राजमहल में एक बार दुर्वासा ऋषि पधारे । कुंती ने एक वर्ष तक ऋषि कि सच्चे मन से सेवा की ।

ऋषिवर जब जाने लगे तो उन्होंने अपनी दिव्यदृष्टि से देखा कि कुंती का विवाह पाण्डु से होगा परन्तु उन्हें पाण्डु से संतान का सुख प्राप्त नहीं हो पायेगा । चूँकि ऋषि दुर्वासा कुंती की सेवा से अति प्रसन्न थे , उन्हीने कुंती को वरदान दिया की वे जब भी चाहेंगी सच्चे मन से किसी भी देवता को बुला कर उनसे पुत्र उत्पन्न करवा पाएंगी ।

ऋषि के जाने के बाद एक दिन कुंती ने दुर्वासा के दिए गए मन्त्र का उच्चारण करके कोतुहलवश ही सूर्यदेव को बुला लिया परन्तु जब सूर्यदेव सच में प्रकट हो गए तो कुंती डर गई और सूर्यदेव से क्षमायाचना करने लगी ।

सूर्यदेव ने कुंती को शांत किया और उन्हें ये बताया की ऋषि का वचन खाली नहीं जा सकता । सूर्यदेव की कृपा से कुंती को अत्यंत तेजस्वी ,कवच और कुण्डल धारण किये हुए एक बालक का जन्म हुआ और यही बालक बड़ा होकर महान योद्धा दानवीर कर्ण कहलाया ।

अविवाहित अवस्था में कुंती के लिए उसे पालना पाना संभव नहीं हुआ तो उन्होंने उसे एक टोकरी में डाल कर नदी में प्रवाहित कर दिया था । भीष्म के सारथी अधिरथ और उनकी पत्नी राधा ने जब एक बालक को नदी में देखा तो उन्होंने उसे वहां से बचाया और उसका पालन पोषण किया ।

कर्ण की शिक्षा

Danveer karn ki kahani in Hindi ( दानवीर कर्ण की जीवनी ) के इस भाग में हम जानेंगे उनके प्रशिक्षण और उन्हें मिले श्रापों के बारे में । कर्ण अपने बचपन से ही बड़ा होनहार और तेजस्वी बालक था । कर्ण के पिता सारथि थे और वे कर्ण को भी सारथी बनाना चाहते थे परन्तु कर्ण चाहते थे कि वो धनुर्धर बने ।

कर्ण गुरु द्रोणाचार्य से धनुर्विद्या सीखना चाहते थे परन्तु द्रोणाचार्य उस समय हस्तिनापुर राज्य के अधीन गुरुकुल में क्षत्रिय राजकुमारों को शिक्षा दे रहे थे । द्रोणाचार्य ने असमर्थता जता दी, उनके मना करने के बाद कर्ण ने गुरु परसुराम जी से खुद को ब्राम्हण बताकर धनुर्विद्या में महारत हासिल की ।

कर्ण ने अपने गुरु कि हर प्रकार से सेवा की और बहुत ज्यादा मेहनत और लगन से युद्ध कला की शिक्षा ग्रहण की। एक दिन परसुराम जी कर्ण की गोद में सो रहे थे तभी एक बिच्छू उनकी जंघा पर काटने लगा । कर्ण नहीं चाहते थे कि उनके गुरु के आराम में कोई विघ्न पड़े इसलिए उन्होंने बिच्छू के काटने का दर्द सहन कर लिया परन्तु वहां से हिले तक नहीं ।

जब परसुराम जी की आँख खुली तो उन्होंने देखा कि कर्ण की जंघा पर खून की धारा बह रही थी । पूरी बात का ज्ञान होने पर परसुराम जी ने कर्ण से कहा कि तुम ब्राह्मण नहीं हो सकते क्यों कि ब्राह्मण इतना दर्द सहन नहीं कर सकता ।

उन्होंने कहा कि तुमने अपनी पहचान छुपाकर मुझ से विद्या ग्रहण की है अतः मैं तुम्हे श्राप देता हूँ कि जब भी तुम्हे मेरे द्वारा सीखी हुई विद्या की सबसे ज्यादा जरुरत होगी तब तुम ये भूल जाओगे ।

कर्ण ने जब परसुराम जी से क्षमा मांगी और उन्हें बताया कि उन्हें स्वयं को अपनी पहचान सही से नहीं है तब परसुराम जी को आत्मग्लानि हुई परन्तु दिया हुआ श्राप वापस नहीं हो सकता था । तब परसुराम जी ने कर्ण को विजय नामक धनुष दिया और वरदान दिया कि तुम्हे विश्व भर में सदियों तक याद किया जता रहेगा।

परसुराम जी के आश्रम से आने के बाद कर्ण इधर उधर घूमते रहे । इसी दौरान वे शब्दभेदी बाण चलने का प्रशिक्षण ले रहे थे । एक बार एक जंगल में कर्ण ने कोई आवाज सुनी और जंगली पशु समझकर बाण चला दिया ।

दरअसल वो बाण एक गाय के बछड़े को लगा और वो मर गया । वो बछड़ा किसी ब्राह्मण का था , ब्राह्मण ने कर्ण को श्राप दिया कि तूने जिस प्रकार असहाय अवस्था में गाय के इस बछड़े को मारा है उसी प्रकार असहाय अवस्था में ही तुम्हारी मृत्यु होगी ।

कर्ण और दुर्योधन की मित्रता

Danveer karn ki kahani in Hindi (दानवीर कर्ण की जीवनी ) का मुख्य पात्र है दुर्योधन जिसकी मित्रता के लिए कर्ण ने हस्तिनापुर का सिंघासन तक ठुकरा दिया था । कर्ण अर्जुन को अपना सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी मानते थे । अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर कहा जाना कर्ण को मंजूर नहीं था ।

जब हस्तिनापुर की रंगशाला में सभी राजकुमारों की शस्त्रविद्या का प्रदर्शन हो रहा था तभी वहां कर्ण आये और उन्होंने अर्जुन को ललकारा और गुरु द्रोणाचार्य को चुनौती दी कि वे बिना परीक्षा लिए किसी को सर्वश्रेष्ठ कैसे घोषित कर सकते है । उस सभा में क्षत्रिओं के द्वारा कर्ण का अपमान ये कह कर किया गया कि ये राजवंशियों की रंगशाला है ।

दुर्योधन ने कर्ण को अपने हिस्से का एक राज्य अंगदेश देकर उन्हें वहां का राजा बना दिया था । दुर्योधन ने ये घोषित किया कि आज से कर्ण अंगदेश के राजा है । कर्ण ने दुर्योधन से पूछ कि इस राज्य के बदले तुम्हे मुझ से क्या चाहिए ।

दुर्योधन ने कहा कि तुम मुझे अपना मित्र बना लो , तुम्हारी मित्रता के अलावा मुझे और कुछ भी नहीं चाहिए । इस प्रकार दुर्योधन और कर्ण की मित्रता हुई जो उनकी मृत्यु तक बनी रही ।

कर्ण ने अपने पूरे जीवन में कभी दुर्योधन का साथ नहीं छोड़ा । हालाँकि बहुत से विषयों पर उन दोनों कि मतभिन्नता थी परन्तु कर्ण बिना मन से ही सही हमेशा दुर्योधन का ही साथ देता था । शकुनि के षड्यंत्रों को कर्ण ने कभी मन से स्वीकार नहीं किया ।

कर्ण हमेशा ये कहता था कि अपने युद्ध कौशल और बाहुबल से ही शत्रु का सामना करना चाहिए । लाक्षागृह की घटना पर भी उनकी मतभिन्नता थी परन्तु कर्ण ने अंततः दुर्योधन का ही साथ दिया । द्यूतक्रीड़ा में भी कर्ण दुर्योधन का मन रखने के लिए ही सम्मिलित हुए थे ।

चित्रांगद की राजकुमारी का स्वयम्बर था , उसमे राजकुमारी ने दुर्योधन को अस्वीकार कर दिया था । अपमानित दुर्योधन ने राजकुमारी का अपहरण कर दिया । इस घटना में वहां पर जितने भी राजा थे सबने उनका पीछा किया परन्तु कर्ण दुर्योधन की ढाल बन गए और अकेले ही सभी राजाओं को हरा कर भगा दिया ।

जरासन्ध, शिशुपाल, दन्तवक्र, साल्व और रुक्मी जैसे राजाओ को अकेले हराने वाले कर्ण को जरासंध ने मगध राज्य का एक हिस्सा दे दिया था ।

लाक्षागृह की घटना के बाद पांडव वर्णावृत चले गए थे । जब महाराजा द्रुपद ने द्रौपदी के स्वयम्बर का आयोजन किया तो वहां दुर्योधन के साथ कर्ण भी उपस्थित थे । द्रुपद में उस स्वयम्बर में बड़ी ही कठिन चुनौती रखी थी । उस सभा में पांडव भी ब्राह्मण के भेष में उपस्थित थे । उपस्थित महान राजाओं मैसे कोई भी उस धनुष को उठा तक नहीं पाया था ।

कर्ण की बरी आने पर कर्ण ने एक ही बार में धनुष को उठा लिया था परन्तु द्रौपदी ने सूतपुत्र कहकर कर्ण का अपमान किया और उन्हें अस्वीकार किया । तब ब्राह्मण के भेष में वहां उपस्थित अर्जुन ने लक्ष का भेदन करके द्रौपदी से विवाह किया ।

द्यूतक्रीड़ा में हारकर जब पांडव 12 वर्ष के वनवास और एक वर्ष कजे अज्ञातवास पर निकल गए उसके बाद दुर्योधन पूरे भारतवर्ष का सम्राट बनना चाहता था । कर्ण ने इस अभियान में भारतवर्ष में अनेक राजाओं पर आक्रमण करके उन्हें हराया और दुर्योधन के अधीन किया ।

कम्बोज, शक, केक‍य, अवन्तय, गन्धार, माद्र, त्रिगत, तंगन, पांचाल, विदेह, सुह्मस, अंग, वांग, निशाद, कलिंग, वत्स, अशमक, ऋषिक और अनेक राज्यों को जीतकर कर्ण ने दुर्योधन के पक्ष में किया ।

कर्ण का दान (दानवीर कर्ण )

Danveer karn ki kahani in Hindi ( दानवीर कर्ण की जीवनी ) के इस भाग में हम ये जानेंगे की वो कोनसे दान थे जिनसे कर्ण दानवीर के नाम से जाना गया । कर्ण सूर्य उपासक थे । वे प्रतिदिन सूर्य की उपासना करते थे । कर्ण ने अपने राज्य में घोषणा कर दी थी सूर्य भगवान् की पूजा अर्चना के पश्चात् उनसे जो कुछ भी दान में माँगा जायेगा वे उसे कभी निराश नहीं करेंगे ।

महाभारत का युद्ध सामने था, इन्द्रदेव को पता था कि यदि कर्ण अपने कवच और कुण्डल के साथ युद्ध में उतरा तो वो अर्जुन का अवश्य वध कर देगा। अर्जुन इंद्रदेव का पुत्र था , इंद्रदेव ने योजना बनाई कि वे कर्ण से दान में उनके कवच और कुण्डल मांग लेंगे । कर्ण के पिता सूर्यदेव ने कर्ण को इंद्रदेव की योजना से आगाह कर दिया था ।

सूर्यदेव की पूजा अर्चना के पश्चात् इंद्रदेव भेष बदल आये और उन्होंने कर्ण से दान में उनके कवच और कुण्डल की मांग की । हालाँकि कर्ण को पहले से पता था कि ऐसा होने वाला है परन्तु अपने वचन के पक्के कर्ण ने उफ़ तक नहीं की और जो कवच,कुण्डल उसके शरीर के अंग थे , काट कल इंद्रदेव को दे दिए ।

इंद्रदेव ने अपना परिचय दिया और कर्ण से कहा कि इसके बदले वे उनसे कुछ और मांग सकते है परन्तु दानवीर कर्ण ने ये कह कर मना कर दिया कि जिसको दान दिया है उसके बदले में कुछ मांगना धर्म के विरूद्ध है ।

कुंती ने भी कर्ण से दान माँगा , कुंती ने पहले कर्ण को उसका असली परिचय बताया ,जिस से कर्ण को ये ज्ञात हुआ कि वे सूतपुत्र नहीं है और अजेय पांडवों के ज्येष्ठ भ्राता हैं । कुंती ने कर्ण से कहा कि वे पांडवों के ज्येष्ठ भ्राता हैं इसलिए वे पांडवों की तरफ से युद्ध लड़ें , विजय के पश्चात् बड़े होने के नाते उन्हें ही सम्राट बनाया जायेगा ।

कर्ण ने खुद को दुर्योधन का कर्जदार बताया और कहा कि अब जब सबकुछ अच्छा हैं तो मैं अपने मित्र को छोड़कर नहीं जाऊंगा । तब कुंती ने दानवीर कर्ण से दान माँगा कि वे ये वचन दें कि युद्ध में केवल एक बार नागास्त्र का प्रयोग करेंगे ।

कर्ण ने ये वचन भी दिया और अपनी माता कुंती को ये भी आश्वासन दिया कि इस युद्ध के बाद उनके पांच पुत्र अवश्य जीवित रहेंगे और वे स्वयं अर्जुन के अलावा किसी और का वध नहीं करेंगे । इसके अलावा भी कर्ण ने कभी किसी को दान के लिए मना नहीं किया ।

महाभारत युद्ध

अपने समय के महान योद्धाओं में शुमार कर्ण इस महायुद्ध के शुरुवाती 10 दिन तक युद्ध नहीं कर पाए और इसका कारण था भीष्म पितामह । भीष्म पितामह महाभारत के पहले 10 दिन तक सेना के प्रधान सेनापति थे और उन्होंने अपने ध्वज के नीचे कर्ण को युद्ध करने की अनुमति नहीं दी । उनके घायल होने के बाद जब ग्रुरु द्रोणाचार्य प्रधान सेनापति बने तब युद्ध के ग्यारवें दिन से कर्ण युद्ध भूमि में उतर पाए ।

कर्ण ने पूरा युद्ध अपनी छवि के अनुरूप ही बड़ी बहादुरी से लड़ा परन्तु धोके से अभिमन्यु वध का दाग उनके दामन पर भी लगा । जिन महायोद्धाओं ने मिलकर अकेले और निहत्थे अभिमन्यु की बर्बरतापूर्वक हत्या की उनमे कर्ण का नाम भी शामिल है । 

युद्ध के चौदहवें दिन भीम के पुत्र घटोत्कच ने कौरव सेना में हाहाकार मचा दिया था । असुर घटोत्कच ने उस दिन युद्ध के नियमों को ताक पर रख कर रात तक युद्ध को जारी रखा, असुर होने के कारण रात्रि में उसके संहारक क्षमता बढ़ जाती है ।

एक समय दुर्योधन को ऐसा लगा की घटोत्कच आज की रात्रि में ही पूरी कौरव सेना का विनाश करके युद्ध को ख़त्म कर देगा । दुर्योधन ने कर्ण से प्रार्थना की कि सिका कुछ उपाय करें । तब कर्ण ने इंद्रदेव द्वारा प्रदान किया गया शक्ति अस्त्र घटोत्कच पर चला कर उसे समाप्त किया और कौरव सेना को हार से बचाया । 

ये अस्त्र कर्ण ने अर्जुन के लिए बचाकर रखा हुआ था और इंद्रदेव से उन्हें इस अस्त्र को एक बार ही उपयोग करने की अनुमति थी ।

उसके बाद वाले दिनों में कर्ण ने अलग अलग सभी पांडवों को युद्ध में परास्त किया परन्तु अपनी माता कुंती को दिए वचन के कारण उन्होंने किसी का वध नहीं किया । अर्जुन के ऊपर कर्ण वैष्णवास्त्र से प्रहार करते है परन्तु वासुदेव श्री कृष्ण रथ को नीचे करके अर्जुन को बचा लेते है ।

 उस दिन युद्ध में कर्ण भारी पड़ते है और उनके सामने अर्जुन निसहाय लगते है, कर्ण अपने वाणों की वर्षा करके अर्जुन को बांध लेते है परन्तु सूर्यास्त हो जाने के कारण अर्जुन बच जाते है ।

युद्ध के सत्रहवें दिन अर्जुन और कर्ण के बीच बहुत ही भयानक युद्ध होता है । उस दिन कर्ण को मिले हुए सभी श्राप एक साथ फलीभूत हो जाते है । कर्ण जब ब्रम्हास्त्र का प्रयोग करना चाहते है तो परसुराम जी के श्राप के कारण वे ब्रम्हास्त्र को प्रकट ही नहीं कर पाते और उसके बाद कर्ण के रथ का पहिया धरती में धंस जाता है ।

 निसहाय अवस्था में श्री कृष्ण के कहने से अर्जुन अन्जलिकास्त्र का प्रयोग करके कर्ण का वध करते है । हालाँकि अर्जुन उस अवस्था में कर्ण पर अस्त्र प्रायः करने से हिचकिचा रहे थे परन्तु श्री कृष्ण ने उन्हें याद दिलाया कि जो युद्ध के नियमों के विरूद्ध जाकर अभिमन्यु का वध कर सकता है , द्रौपदी को भरी सभा में वैश्या कह सकता है वो इस सम्मान का हकदार नहीं है कि हम उसके रथ के पहिये के ठीक होने तक इंतज़ार करें ।

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